आसन एक लाभ अनेक – सर्वांगासन

अन्य आसनों में एक दो प्रमुख अंग प्रभावित होते हैं परंतु सर्वांगासन में सभी अंग सुचारू रूप से प्रभावित होते हैं। इसलिए इसे सर्वांगासन कहते है। इसे सब आसनों के बाद किया ज्यादा जाता है। कारण, अन्य आसन करते करते शरीर गर्म हो जाता है जिससे कि इसे करने में, इसके लाभों को प्राप्त  कर सकने में सुविधा होती है।

सर्वांगासन के अभ्यास से मस्तिष्क, स्नायुमण्डल, नलिका विहीन ग्रन्थियाँ, श्वसन, रक्त प्रणाली, कंठ, पेट तथा शारीरिक सौंदर्य पर विशेष प्रभाव आता है।

बच्चों, युवकों, युवतियों , वृद्धों व महिलाओं के लिए इसका अभयास ऊपयोगी है ।हलासन का अच्छा अभ्यास करने के बाद सर्वांगासन अच्छी तरह से होने लगता है । हलासन के बारे मे अधिक जानकारी के लिए आगे दिए गए लिंक पर जाएं । ( हलासन )

सर्वांगासन के लाभ-

  • शरीर को बिलकुल सीधा करने मेरुदण्ड का ग्रीवदेशिय भाग,जहां सबसे उर्वर स्नायुओं का जाल बिछा है तथा जो मस्तिष्क के पिछले भाग तक चला जाता है, वह प्रभावित होकर अवरोधमुक्त, सचेत तथा सशक्त बनाता है।
  • मस्तिष्क रक्त से सहज ही पोषित हो जाता है। परंतु इस भाग में रक्त का अति प्रवाह इसलिए नहीं बढ़ पाता क्योंकि ठोड़ी कण्ठकूप में लगी रहती है। इस विशेषता को शीर्षासन की तुलना में सर्वांगासन का विशेष लाभ माना जा सकता है।
  • मस्तिष्क की रक्त से सिंचाई होने से मस्तिष्क में रक्तवाहिनी की समस्त बाधाएं ( vascular spasms ) जो प्रायः सिरदर्द का कारण बनती हैं, दूर होती हैं।
  • युवाग्रन्थि अर्थात थाइरॉइड पर दबाव डालने से बड़ा अनुकूल प्रभाव पड़ता है। इसके hormones रक्त धारा में सुचारू रूप से मिलते है तो उनके उत्तेजन से अन्य नलिकविहीन ग्रन्थियों के स्राव भी नियंत्रित हो जाते हैं। अतः पुरे धातु परिपोषक क्रम को स्वास्थ्य प्राप्त होता है।
  • मूलबन्द एवं उडिडयान बंध लगाने से इसका प्रभाव बस्ती प्रदेश में स्तिथ जन्नग्रँथियों या कामग्रँथियों पर पड़ता है। हमारी मानसिक शक्ति, शारीरिक शक्ति तथा यौन शक्ति इन्ही पर निर्भर करती है।
  • पैनक्रियाज तथा एड्रिनल ग्रन्थि भी उडिडयान बंध लगाने से प्रभावित हो जाती है।
  • शरीर में अधोगामी शक्ति जो सभी प्राणीयों में है, वह मस्तिष्क की ओर आकर उर्ध्वगामी बनती है।
  • सर्वांगासन की पूर्ण स्तिथि में फेफड़ों के ऊपरी भागों में श्वास प्रश्वास क्रिया रुक जाती है। इसका रुख बलपूर्वक फेफड़ों के निचले भाग व पेट की ओर हो जाता है, जिससे सम्पूर्ण शिरामण्डल का रक्त स्नान हो जाता है। फेफड़ो के निचले भाग के वायु छिद्र निर्जीव नहीं हो पाते। फेफड़ों तथा उदर सम्बन्धी अंगों में चेतना व शक्ति का संचार होता है। इसी कारण दमे के रोग नहीं हो पाते।
  • रक्त संचार का उचित प्रवाह व रक्त शुद्धि में सर्वांगासन का विशेष योगदान है। हृदय, फेफड़े व मस्तिष्क में रक्त प्रचुरता से पहुंचता है।
  • टॉन्सिल आदि गले के सम्पूर्ण विकार तो दूर होते ही है , कंठ मधुर बनता है, साथ ही गला, आँख, नाक, कान आदि भी स्वस्थ होते हैं।
  • सम्पूर्ण अंगों में शुद्ध रक्त पहुंचने से सम्पूर्ण कोषाणु प्रभावित होते हैं, तथा यह त्वचा को सुंदर रूप प्रदान करते हैं। यहाँ तक की बालो की जड़ो में रक्त का पोषण होने से बालों का झड़ना व पकना रुक जाता है।
  • बांझपन,बवासीर, बच्चेदानी की गड़बड़ी, बहरापन, बह्मचर्य खण्डन, शरीर का विकास न होना, स्वप्नदोष, मानसिक विकार, मधुमेह, स्मरण शक्ति व मेधाशक्ति का ह्रास आदि दोष दूर होते हैं।
  • डायफ्राम मस्तिष्क की ओर उठता है। इसके पाचन – तंत्र सशक्त बनता है। कब्ज टूटती है।
  • थकान दूर करने व स्फूर्ति लाने में भी यह सर्वांगासन प्रसिद्ध है।
  • सर्वांग की पूर्ण स्तिथि कुछ समय बनाये रखने पर शरीर का सम्पूर्ण रक्त सभी अंगों से मस्तिष्क की ओर जाता है तथा वापस आने पर यह रक्त पैरों की ओर लौटता है। इससे सभी अंगों का नवीनीकरण हो जाता है।

सर्वांगासन विधि

कमर के बल आसन पर लेट जाएं। टाँगों को सीधा करें। एड़ी व पंजों को मिलाकर पंजों को आगे की ओर तानें। दोनों हाथ शरीर के साथ पूरे खिंचाव की स्तिथि में रखें। हथेलियों का रुख पृथ्वी की ओर हो। सिर से लेकर पंजों तक सारा शरीर सीधा व तना हुआ रहे।

श्वास भरते हुए पंजों को बहुत धीरे धीरे ऊपर की ओर उठाएं। 90०के कोण पर पैरों को कुछ समय के लाइट रोक दें। श्वास बाहर निकलते हुए तथा हतेलियों पर जोर देते हुए, अपने पैरों को सिर को पृथ्वी के समानांतर लें आएं। श्वास को स्वाभाविक स्तिथि में लाते हुए इस स्थिति में कुछ समय रुकें। इस स्थिति में पंजों का तनाव बराबर बना रहे।

घुटने भी सीधे रहें। दोनों हाथों से कमर को सहारा देते हुए धीरे धीरे पंजों को  आसमान की ओर तानें। कमर पर पूरी हथेलियाँ, नीचे से नीचे इस प्रकार रखें कि कंधों पर सारा शरीर एकदम सीधा हो जाये। छाती को ठोड़ी के साथ लगाएं। पंजों को ढीला कर दें और आसन में स्थिर होकर यथाशक्ति रुकें।श्वास सामान्य रहेगा। इस आसन में अच्छा अभ्यास हो जाये तो मूलबन्ध तथा जालंधर बन्ध भी बीच बिच में लगाने से इसके लाभ बहुत अधिक बढ़ जाते हैं।

पंजों को तानते हुए घुटनों को सीधा रखते हुए धीरे धीरे पैरों को सिर की ओर तथा पृथ्वी के समानांतर ले आएं। हाथों को सीधा करके पूर्व स्थिति में निकट से निकट रखें। कुछ समय रुकने के बाद हथेलियों पर पूरे शरीर का भर नियंत्रित करते हुए रीढ़ की एक एक गोटी को धीरे धीरे पृथ्वी पर लगाते जाएं। पूरी कमर जब पृथ्वी पर आ जाये तो तने हुए पंजों व घुटनों को उस स्थिति में कुछ समय फिर रोकें। उसके बाद अति मन्द गति से टांगों को पृथ्वी की ओर लाते हुए एड़ियों को सहजभाव से पृथ्वी पर रखें। शरीर ढीला छोड़ दें और विश्राम करें। ध्यान का केंद्र – विशुद्धि चक्र

सर्वांगासन के समान ही शीर्षासन के भी अनेक लाभ है । शीर्षासन के बारे में अधिक जानकारी के लिए आगे दिए गए लिंक पर जाए । (शीर्षासन लिंक) अपने महत्वपूर्ण सुझाव हमे कमेंट बॉक्स में लिखना न भूलें। योग को अपने जीवन मे नॉयमित रूप से अपनाएं।

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Nidhi Patel

Specialized in Vedic literature with professional experience in field of Ayurveda , & one year experience in content writing makes me able to share my views with others for the benefits of mankind

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