फूलों में ढूंढे अपने रोगों का उपचार-एरोमा थेरैपी

हमारे आयुर्वेद की सबसे प्रमुख खासियत यही है कि उसमें प्रकृति के साथ रहना सिखाया गया है, प्रकृति का आदर करना सिखाया गया है । भारतीय वेदों के अनुसार जिस पंचमहाभूत से यह सृष्टि बनी है उसी पञ्च महाभूत से हमारे शरीर भी बना है। और अगर हमारे शरीर में किसी भी तत्त्व की कोई भी कमी होती है तो उसे प्रकृति में ही ढूंढ लिया जाता है।

गुलाब , कमल , चमेली, सूरजमुखी , पलाश , गेंदा , पारिजात (हरसिंगार) , मौलसिरी (बकुल) , बबूल (कीकर), शंखपुष्पी ( विष्णुकांता) आदि फूलों का वर्णन आयुर्वेद में चिकित्सीय प्रयोग की दृष्टि से किया गया है।

फूल का  सुगंधीय कण हमारे वातावरण में मिलकर नासिका  में पहुंचकर अपनी सुगंध का आभास कराता है। यह सुगंध मस्तिष्क के विभिन्न स्थानों पर अपना प्रभाव दिखता है । इस सुगंध का मस्तिष्क ,ह्रदय, आँख और पाचन क्रिया आदि पर उचित  प्रभाव पड़ता है। इस उपचार  के तरीके को ‘एरोमा थेरैपी’ कहा जाता है।

कमल

कमल के फूल के अंदर कुछ दाने  निकलते है जिंक रंग हरा होता है, जिन्हें भून कर मखाने बना दिए जाते हैं। यदि इन दोनों (कमल गट्टे) को कच्चा छीलकर खाये तो ओज़ एवं बल की वृद्धि होती है। इनका गुण शीत और मधुर होता है। यह रक्तशोधक, पित्त, कफ और वात को शांत करने वाला है।

गुलाब

गुलाब का गुल -कंद रेचक है । यह पेट और आंतो की गर्मी शांत करके आरोग्यता देता  है। गुलाब का अर्क भोज्य पदार्थों में प्रयोग किया जाता है। इसका प्रयोग शीतवर्धक होता है। इसका तेल का उपयोग सर पर करने से मष्तिष्क ठंडा रहता है।

चम्पा –

चंपा के फूलो को पीस कर कुष्टरोग के घाव पर लगाया जाता है तथा इसका अर्क – कृमि को नष्ट करता है । इसके फूलों का चूर्ण खुजली में उपयोगी होता है।

चमेली

चमेली के पुष्पों का तेल चर्म रोगों , पायरिया , दंतशूल , मुख के छाले आदि में प्रयोग किया जाता है। यह शरीर के रक्त संचार को बढ़ाकर स्फूर्ति प्रदान करता है।

सूरजमुखी

इस पुष्प में विटामिन A तथा विटामिन D होता है। यह सूर्य का प्रकाश न मिलने वाले रोगो को नष्ट करता है तथा इसका तेल ह्रदय रोगों में कोलेस्ट्रॉल के प्रभाव को न्यून करता है।

पलाश  (ढाक) –

ढाक के गुच्छेदार फूल सभी को अपनी ओर आकर्षित करते हैं। इसका चूर्ण पेट के किसो भी प्रकार के कृमि का नाश करने में सहायक है। वेदों में पलाश को ब्रह्ना वृक्ष कहा गया है। किंशुक , याज्ञिक, सुपर्ण, त्रिपर्ण आदि इसके अनेक नाम है। चरकसंहिता में पलाश के 38 प्रयोग बताये गये है। इसका प्रयोग प्रमेह, कुष्ठ, शोध ,अतिसार, अर्श, गृहणी और कास रोगों में किया जाता है।

गेंदा

गेंदे की खेती वाले स्थानों पर मलेरिया का प्रकोप दूर हो जाता है। लिवर के रोगी की सूजन , पथरी एवं चर्मरोगों में इसका प्रयोग किया जाता है।

पारिजात (हारसिंगार) –

इसके पुष्प का प्रयोग गठिया रोगों में किया जाता है। इसका लेप चेहरे की कांति को बढ़ाता है।

मौलसिरी (बकुल) –

इसके पुष्पों के तेल से इत्र बनता है। त्वचा की कोमलता के लिए इसके चूर्ण का लेप बना कर लगाते हैं। इसका शरबत स्त्रियों के लिए रसायन का काम करता है।

बबूल (कीकर) –

बबूल के फूलों को पीसकर सर पर लगाने से सिरदर्द दूर हो जाता है। इसका लेप एग्जिमा, चर्मरोग और दाद पर प्रयोग किया जाता है। इसके कुल्ले दन्त पीड़ा को ठीक करते हैं। इसके अर्क का सेवन रक्तविकार को दूर करता है।

शंखपुष्पी (विष्णुकांता) –

शंखपुष्पी गर्मियों में खिलाते हैं।यह घास को पीस कर पानी में मिलाकर तथा छानकर शहद या मिश्री के मिश्रण को  पीने से मस्तिष्क को शीतलता और ताजगी मिलती है। विद्यार्थियों के लिए शंखपुष्पी अत्यंत लाभकारी है।

 

Our Score
Our Reader Score
[Total: 2 Average: 5]

Nidhi Patel

Specialized in Vedic literature with professional experience in field of Ayurveda , & one year experience in content writing makes me able to share my views with others for the benefits of mankind

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Ajax LoaderPlease wait...

Subscribe For Latest Updates

Want to be notified when our article is published? Enter your email address and name below to be the first to know.