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क्या है कैंसर (Cancer)

कैंसर (Cancer) का अर्थ है शरीर के किसी  भाग में नुक्सान दायक सूजन , फोड़ा या रासौली का होना , जिसे हटाने पर वो फिर हो जाती है। फोड़ा, रसौली असामान्य, अनियंत्रित और लगातार फैलने वाली कोशिकाओं का गुच्छा होती है। कैंसर केकड़े की तरह चारो और फैलता है। 3 लाख लोग हर साल इससे दम तोड़ देते है। कैंसर लगभग 37 प्रकार के होते है ।

कैंसर (Cancer) कैसे फैलता है

हमारे शरीर में 600 ख़राब विभिन्न कोशिकाएं है, जिनकी निरंतर टूट फुट होती रहती है तथा उनका नया निर्माण होता रहता है । यह प्रक्रिया प्लीहा (तिल्ली) द्वारा होती है । उनका संचालन लिम्फ ग्रंथि करती है। शरीर की उपेक्षा करने तथा कुदरती नियमो को भंग करने पर नई कोशिकाओं के निर्माण की प्रक्रिया मंद पड़ जाती है । कोशिकाएं अत्यधिक क्षीण होने पर शरीर में विकृति आ जाती है। कमजोर हुई लिम्फ ग्रंथि अंतःस्रावी ग्रंथियों को नुकसान पहुंचाती है  । वे हॉर्मोन्स का उत्पादन करना बंद कर देती है। फिर उनका हानिकारक विकास बड़ी तेज़ी से होने लगता है।

कैंसर (Cancer) के लक्षण

मल मूत्र में बदलाव आना , घाव देर से भरना , कहीं भी सूजन होना , पाचन शक्ति कमजोर होना , भोजन निगलने में दिक्कत होना , आवाज़ भरी होना , भयंकर और लगातार सर दर्द होना , दृष्टि में प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है । लगातार बुखार रहना , वजन घटना , काम करने में मन न लगना, चुप बैठे रहना , भूख कम होना , लगातार खांसी रहना , गले में रूखापन रहना , सम्भोग के बाद रक्तस्राव होना , मासिक धर्म में परिवर्तन होना , बिना कारण के शरीर से खून  में बहना, शरीर में गिल्टी होना या सख्त होना , मल मूत्र के साथ खून होना, रोजमर्रा की आदतें बदल जाना आदि।

कैंसर (Cancer) होने के कारण

कैंसर अज्ञानता , कुपोषण, विकृत जीवन शैली, तनाव, व्यायाम न करना , अधिक प्रसव , गुप्तांगो में अस्वछ्ता, यौन स्वछंदता, HIV तथा HPV वायरस , प्रदूषण, धूम्रपान, शराब, पान मसाला , गुटका, खैनी, जर्दा व सुपारी का अधिक सेवन करना , लंबे समय तक गर्भ निरोधक गोली खाना , फलों व सब्जियों पर कीटनाशकों का प्रयोग होना , फास्ट फूड , अति वसा व शर्करा का सेवन , सूअर व भेड़ का मांस खाना  आदि कारणों से होता है । मोटापा भी एक बड़ा कारण है ।

यौगिक उपचार

यदि समय रहते कैंसर का पता चल जाता है तो कैंसर को हटाया जा सकता है  । योगाभ्यास रोग की प्रतिरोधक शक्ति को बढ़ाता है ।शरीर में जमे विषाक्त तत्वों को निकाल फेकता है तथा कैंसर की सम्भावना को नष्ट करने में सहायक सिद्ध हुआ है। सभी तरह के कैंसरों पर विजय पाई जा सकती है।

शुद्धि क्रियाएँ

  1. कुंजल क्रिया – पांच ग्लास पानी उकड़ू बैठ कर लगातार पीएं । दोनों हाथ घुटनो पर रख के उठे । 90 डिग्री का कोण बनाकर खड़े हों । बायां हाथ पेट पर रखे । दाएं हाथ की पहली तीन उँगलियों से छोटी जीभ को छुएं जब तक अधिकांश पानी न निकल जाये , न तो सीधे हो न ही मुह से उँगलियाँ निकाले । बाद मे कापालभाति करें।
  2. सहज वस्ति – यदि कब्ज हो तो आधा चम्मच नमक , 1 निम्बू के रस को 2 -3 ग्लास गर्म पानी में मिला ले और सवेरे पी ले। पीठ के बल लेट कर विपरीत करणी मुद्रा 4-6 मिनट , शलभासन 4 बार तथा पादहस्तासन 4 बार करें। मल त्याग करने की प्रेरणा न हो तो भुजंगासन , उष्ट्रासन आदि आसन भी करें। यदि रोगी कमजोर हो तो पानी पीने के बाद विपरीत करणी मुद्रा , योग मुद्रा, पवन मुक्तासन तथा शशकासन करें
  3. प्राणायाम – कापालभाति , नाड़ी शोधन तथा भ्रामरी प्राणायाम करें । प्रत्येक पांच मिनट करें ।
  4. ध्यान –  5 से 15 मिनट तक ध्यान करें। भाव यह रहे की मेरे ऊपर सुनहरी किरण बरस रही है। मेरा रोम रोम स्वस्थ हो रहा है । मेरे पूर्व जन्म के संस्कार कट रहे हैं।यह कष्ट तो प्रभु का प्रसाद है, जो मुझे सहर्ष स्वीकार है। उस तरह भावपूर्ण ध्यान से अनेक चमत्कार हुए है।
  5. मुद्राएं(क) अपान मुद्रा – दोनों बीच की उँगलियों के अंतिम छोरो को अंगूठे के छोर से स्पर्श करें। इसका अभ्यास 30-48 मिनट दोनों हाथों से करे। इससे रक्त शुद्ध होगा। अपान मुद्रा के बारे में और अधिक जानकारी के लिए इस लिंक पर जाएं ( कैसे हो शरीर के मल पदार्थ का विसर्जन : अपान मुद्रा )

                      () प्राण मुद्रा – कनिष्ठा व अनामिका के छोरो को अंगूठे से स्पर्श करें । इसे 10 -30 मिनट तक दोनों हाथों से करें । शरीर में ऊर्जा आएगी और रक्त शुद्ध होगा।

                      (ग) पंकज मुद्रा – दोनों हथेलियों के भीतरी किनारों को आपस में मिला लें । शेष अंगुलियां व अंगूठे को कमल की तरह खोलें। 10 मिनट तक इसे लगाए । इससे ट्यूमर व रक्त दोष दूर होगा , सकारात्मक विचार बने रहेंगे । सर्दी में इसका प्रयोग ज्यादा देर तक न करें।

  • दोपहर में – 20 मिनट तक टब में बैठकर सर्दी के गुनगुने पानी में कटी स्नान करें। स्नान करते करते 20 आवृत्तियाँ अग्निसार क्रिया करें अर्थात पूरा सांस निकाल कर नालीमूल को बार बार रीढ़ की ओर धकेले । तीन मिनट तक नाड़ी शोधन प्राणायाम करें।
  • सांयकाल में – भ्रमण प्राणायाम करें , अर्थात शरीर को सीधा रखते हुए घूमने जाएँ तथा सर्वांगासन , मत्स्यासन, पश्चिमोत्तानासन को क्रमश 4 मिनिट , 2 मिनट तथा 4 बार करें। 35 मिनट अग्निसार क्रिया करें। नाड़ीशोधन प्राणायाम तीन बार 1:1:2 के अनुपात में करें।

वेदों द्वारा बताये गये चिकित्सीय परंपरा बहुत ही समृद्धशाली तथा अपनाने योग्य है । इसने बड़े से बड़े व असाध्य रोगों के इलाज को प्रकृति में ही ढूंढ निकाला है । ऐसे अनेक असाध्य रोगों को ठीक करने  के लिए और आयुर्वेद को अपने जीवन से पूर्णतः ढालने के लिए हमे subscribe करना न भूलें। अपने महत्वपूर्ण सुझाव कमेंट बॉक्स में जरूर लिखें।

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Nidhi Patel

Specialized in Vedic literature with professional experience in field of Ayurveda , & one year experience in content writing makes me able to share my views with others for the benefits of mankind

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