निरोग जीवन जीने का रहस्य : ऋतुचर्या

हमारे शरीर पर अलग अलग ऋतुओं और ऋतुचर्या  का बहुत प्रभाव पड़ता है। एक ऋतु में कोई एक दोष (वात , पित्त, कफ) बढ़ता है , तो कोई शांत होता है और दूसरी ऋतु में कोई दूसरा दोष बढ़ता है तथा अन्य शांत होता है।  इस तरह हम कह सकते है कि मनुष्य के स्वास्थ्य के साथ ऋतुओं का गहरा संबंध है । अतः आयुर्वेद में प्रत्येक ऋतु में दोषों से होने वाली वृद्धि , प्रकोप या शांति के अनुसार सब ऋतुओं के लिए अलग अलग प्रकार के खान पान और रहन सहन (आहार – विहार) ऋतुचर्या का उल्लेख किया गया है । इसके अनुसार आहार – विहार अपनाने से स्वास्थ्य की रक्षा होती है तथा मनुष्य रोगों से बचा रहता है।

ये ऋतुएं हैं : वसंत , ग्रीष्म , वर्षा , शरद , शीत (हेमंत और शिशिर)

शीत ऋतु ( हेमंत शिशिर)

पथ्य आहार (dietary diet) :

शीत ऋतु में चिकनाई , मधुर , लवण और अम्ल रस युक्त तथा पोशाक तत्वों वाले पदार्थो का सेवन करना चाहिए । इन पदार्थों में शुद्ध घी , माखन , तेल , दूध , उड़द की खीर , मिश्री , रबड़ी , मलाई , गन्ने का रस , दलिया , मेवों से बना पदार्थ आदि उपयोगी है। अनाजों में अंकुरित चना , मूंग , उड़द, गेंहू या चने की रोटी , कॉर्नफ्लैक्स , वर्षभर पुराने चावल , मौसमी फल जैसे – सेब , आंवला , संतरा आदि । सब्जियों में – परवल , बैंगन , गोभी , जिमीकंद , पके लाल टमाटर , गाजर , सेम ,मटर , पालक , बथुआ , मेथी आदि के हरे साग , सोंठ , गर्म जल तथा गर्म पदार्थ स्वास्थ्यवर्धक और पोषक है ।

पथ्य विहार  ( रहनसहन ) :

पथ्य आहार के साथ पथ्य विहार को भी ठीक तरह से अपनाना आवश्यक है । सबसे पहले तो मन प्रसन्न और चिंतारहित होना चाहिए । इस ऋतु में व्यायाम और योगासन करना चाहिए । सरसों के तेल से मालिश , उबटन (हल्दी का) व सिर पर तेल मलना खास उपयोगी है । सरसों के तेल की मालिश से त्वचा , सुन्दर और निरोग बनती है तथा फोड़े , फुंसिया नष्ट होते हैं। इस मौसम में ठण्ड लगने से जुकाम , बुखार , निमोनिया , आदि हो सकते हैं । त्वचा रूखी होती है तथा शीतल वात से खांसी , श्वास , गठिया जोड़ो का दर्द , खुजली आदि हो सकती है । अतः ठंडी हवा से बच कर रहना चाहिए

संत ऋतु  (spring)

पथ्य आहार  : 

इस ऋतु में ताज़ा हल्का और सुपाच्य भोजन करना चाहिए । कटु रस युक्त , तीक्ष्ण और कषाय पदार्थों का सेवन लाभकारी है। मूँग , चना , और जौ की रोटी , पुराना गेहूँ और चावल ,जौ , चना , राई , भीगा व अंकुरित चना , मक्खन लगी रोटी, हरी शाक- सब्ज़ी एवं उनका , सरसों का तेल , सब्जियों में – करेला, लहसुन , पालक, केले के फूल , जिमीकन्द  व नीम की नई कोपलें , सोंठ , पीपल, काली मिर्च , हरड़, आँवला, धन की खील , नींबू, मौसमी फल तथा शहद का प्रयोग उपयोगी है। अदरक डाल कर तथा शहद मिलाकर जल तथा वर्षा का जल पीना चाहिए ।

पथ्य विहार :

नियमित रूप से हल्का व्यायाम अथवा योगासन करना चाहिए । सूर्योदय से पहले भ्रमण करने से स्वास्थ्य में वृद्धि होती है । तैल मालिश करके तथा उबटन लगा कर गुनगुने पानी से स्नान करना हितकारी है। औषधियों से तैयार धूमपान तथा आँखों में काजल का प्रयोग करना चाहिए । स्नान करने के बाद शरीर पर कपूर, चन्दन आदि सुगन्धित पदार्थों का लेप लाभकारी होता है।

्रीष्म  ऋतु (summer)

पथ्य आहार :

गर्मी के मौसम में हल्का , चिकना, सुपाच्य , ठंडा और पेय पदार्थों का सेवन अधिक मात्रा में करना चाहिए । पुराने जौ , सब्जियों में चौराई ,करेला , टमाटर ,आलू छिलके सहित, प्याज,  पोदीना , नीम्बू आदि । फलों में मिर्च ,संतरा , आम और अंगूर , हरी ककड़ी , शहतूत , फालसा , अनार , आंवले का मुरब्बा आदि । इस मौसम में ज्यादा से ज्यादा तरल पदार्थों का सेवन करना चाहिए। इस मौसम में खाना चबा चबा कर तथा कम मात्रा में करना चाहिये।

पथ्य विहार :

इस ऋतु में वृक्षों से भरे बाग बगीचों में घूमना स्वास्थ्यवर्धक होता है। शरीर पर चन्दन लगाना चाहिए  और मोतियों से बने आभूषण पहनने चाहिए क्योंकि मोती में शीतलता करने का गुण होता है। इस ऋतु में सूती तथा हल्के वस्त्र पहनने चाहिए।

र्षा ऋतु  ( rainy) :

पथ्य आहार :

वर्षा ऋतु में हल्के , सुपाच्य , ताजे , गर्म , और पाचक अग्नि को बढाने वाले खाद्य पदार्थों का सेवन हितकारक है । ऐसे पदार्थ लेने चाहिए  , जो वात को शांत करने वाला हो । इस दृष्टि से पुराने अनाज जैसे गेहूँ , जौ , मक्का , सरसों , राई, खीरा , खिचड़ी ,दही , मट्ठा , मूंग और अरहर की दाल । सब्जियों में – लौकी  , भिन्डी , तोरई , टमाटर और पुदीना की चटनी हितकारी है । इस मौसम में पके और गूदेदार जामुनों का नियमित रूप से सेवन करने से त्वचा के रोग , जलन और प्रमेह रोगों में लाभ मिलता है ।

पथ्य विहार :

इस ऋतु में जल की शुद्धि का विशेष ध्यान रखना चाहिए । जल में तुलसी के कुछ पत्ते और फिटकरी (चावल के दाने के बराबर)  पीस कर मिलाने से भी जल शुद्ध हो जाता है। शरीर पर उबटन मलना और , मालिश और सफाई करना लाभदायक है। वस्त्र साफ सुथरे व हल्के पहनने चाहिए।

रद ऋतु  (autumn) :

पथ्य आहार :

इस ऋतु में कुपित पित्त को शांत करने के लिए घी और तिक्त पदार्थों का सेवन करना चाहिए। शाली चावल , गेहूँ, जौ , उबाल हुआ दूध , दही , मक्खन , घी , मलाई आदि । सब्जियों में चौलाई , बथुआ , लौकी , तोरई, फूलगोभी, मूली , पालक , सोया और सेम । आंवले को शक्कर के साथ खाना चाहिए। इस ऋतु में जल अगस्त्य तारे के प्रभाव से पूरी तरह विष व अशुद्धि से रहित हो जाता है। आचार्य चरक ने इस जल को हंसोदक कहा है ।

पथ्य विहार :

इस ऋतु में खिलने वाले फूलो को आभूषणों के रूप में प्रयोग में लाना चाहिए। रात्रि के समय चंद्रमा की किरणों में बैठने , घूमने या सोने से स्वास्थ्य पर अच्छा प्रभाव पड़ता है।

 

Our Score
Our Reader Score
[Total: 3 Average: 5]

Nidhi Patel

Specialized in Vedic literature with professional experience in field of Ayurveda , & one year experience in content writing makes me able to share my views with others for the benefits of mankind

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Please wait...

Subscribe For Latest Updates

Want to be notified when our article is published? Enter your email address and name below to be the first to know.