मस्तिष्क के किये प्रभावी आसन : विपरीतकर्णी आसन

शरीर के अनेक रोगों में लाभ तथा मन को शांत रखने में भारतीय समाज में योग का बहुत बड़ा योगदान रहा है।योग में आसनो के साथ साथ मुद्राओं की भी महत्ता है। योग में आसन और मुद्रा दोनों से लाभ होता है तथा दोनों अपने स्थान पर महत्वपूर्ण है। योग में 14 महत्वपूर्ण मुद्राओं में से विपरीतकर्णी मुद्रा भी एक है। आसन का सम्बन्ध नस – नाड़ियों से अधिक होता है। परंतु मुद्रा में प्राण और मन का भी विशेष सम्बन्ध होता है। इसलिए मुद्रा की सार्थकता आसन से कही अधिक है। शरीर में स्नायु ,मज्जा तन्तु (bone marrow) ,  मन, प्राण आदि के कार्य निरन्तर होते रहते हैं। फलतः प्राण – शक्ति व आयु में कमी आती रहती है। इस क्षय से बचना ही यौगिक क्रियाओं का लक्ष्य है। इसकी महत्वपूर्ण भूमिका मुद्रा निभाती है। वह मुद्रा एक तरह से सर्वांगासन का ही रूप है।

  • यूँ तो सर्वांगासन के सभी लाभ विपरीतकर्णी आसन से प्राप्त हो जाते हैं। इसके अतिरिक्त कुछ लाभ और भी हैं। हमारे शरीर से अमृत सदैव नाभिमण्डल में जाकर भस्म होता रहता है। इस किया में नाभि ऊपर (विपरीत) होने से इस अमृत का सदुपयोग उच्चस्थ केंद्रों में हो पाता है।
  • विपरीतकर्णी आसन में रक्तदोष शीघ्रता से दूर होते हैं। स्नायु बलिष्ठ होते हैं। थकान मिटती है। अम्ल रक्तता( acidosis) दोष दूर होते हैं।
  • विपरीतकर्णी आसन से शरीर में लचीलापन भी आता है। तथा शरीर मजबूत बनता है।
  • सर्वाइकल व मस्तिष्क में रक्त प्रचुर मात्रा में जाने से वहां पर हुए विकार पूर्णतः ठीक हो जाते हैं । मस्तिष्क का कार्य सुचारू रूप से होने लगता है।
  • भोजन के उपयोगी तत्व को ग्रहण करने तथा अनावश्यक द्रव्य को अलग करने की सारी प्रक्रिया ( metabolism ) इससे प्रभावित होती है तथा संपूर्ण ग्रन्थियां विशेषतः पैनक्रियाज( पेट ढीला छोड़ने से) पर सकारात्मक प्रभाव आता है।।
  • यौनग्रन्थि (gonads), सिरदर्द, चक्कर आने का दोष आदि शांत होते हैं।

विपरीतकर्णी आसन विधि

सर्वांगासन की पूर्ण स्तिथि में हथेलियां कमर के ऊपरी भाग के साथ ( नीचे से नीचे ) इसलिये लगाई जाती है कि समूचा शरीर सीधा रहे। परन्तु विपरीतकर्णी आसन में सिर तथा सर्वाइकल क्षेत्र ( गर्दन- कंधे) पृथ्वी से लगा रहता है और हथेलियां कटी प्रदेश ( नितम्बों से ऊपर) से लगी रहती है, जिससे की नितम्बों से लेकर पंजो तक का पूरा भाग आसमान को ओर तिरछा होकर तन जाता है। इसमें श्वास स्वाभाविक रहता है।

ध्यान का केंद्र – विशुद्धि चक्र (ध्यानकेद्र बिंदु के बारे में अधिक जानकारी के लिए इस लिंक पर जाएं) ( योग करते समय कहाँ रहे हमारा ध्यान केंद्र बिंदु (Focus Centre Point) or चक्र? )

नोट-

  1. विपरीतकर्णी आसन के बाद मत्स्यासन को उपासन के रूप में अवश्य करना चाहिये।
  2. सर्वांगासन दृढ होने पर विपरीतकर्णी सहज हो जाती है।
  3. मुद्रा होने के कारण इसका प्रभाव विशेष है।
  4. मस्तिष्क में रक्त की पूर्ति करने की यह अति प्रभावशाली क्रिया है।

योगासन करते रहें और अपने आप को रोगों से मुक्त करते रहें तथा हमारा पोस्ट आपको कैसा लगा यह हमें कॉमेंट बॉक्स में जरूर बताएं।

इस विपरीतकर्णी आसन को करने के पश्चात् मत्स्यासन को जरूर करें ।   मत्स्यासन के बारे में अधिक जानकारी के लिए आगे  दिए गए लिंक पर क्लिक करें ( बीमारियों को आपके पास न आने दे – मत्स्यासन )।

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Nidhi Patel

Specialized in Vedic literature with professional experience in field of Ayurveda , & one year experience in content writing makes me able to share my views with others for the benefits of mankind

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