Back bone से जुड़ी समस्याओं के लिए करें – भुजंगासन

फन उठाते भुजंग (सांप) जैसी आकृति इस आसन से बनती है। इसलिए इसका नाम भुजंगासन है। सांप का शरीर लाचरेल होता है। इस आसन में भी यही लाभ मिलता है। सुप्त वज्रासन के अभ्यास में हाथों को सर की ओर लाने से रीढ़ के ऊपरी भाग में रक्त प्रचुर मात्रा में पहुँचता है। इसलिए उसके बाद यह आसन करने पर गर्दन पीछे मोड़कर अधिक ऊपर उठाई जा सकती है। फलस्वरूप सर्वाइकल रक्त से पोषित उस भाग को और लचीला एवं स्वस्थ बना देता है।

कई महिलाओं को सर्वाइकल की पीड़ा थी। उन्हें केवल भुजंगासन का अभ्यास कराया गया । इससे उनकी पीड़ा कुछ ही दिनों में समाप्त हो गयी , साथ ही मासिक धर्म संबंधी अनियमितताएं भी ख़त्म हो गयी।

रीढ़ जो हमारे शरीर का महत्वपूर्ण अंग है तथा मस्तिष्क का विस्तार अंग है, वह भी इस आसन में पूर्णरूप से प्रभावित होती है। रीढ़ की गोटियों का दूर होने या मिलना, खिसकना आदि सब दोष दूर होते हैं। रीढ़ पर जो अंतरंग प्रभाव इस आसन पर पड़ता है , शायद ही किसी और आसन से पड़ता हो।

  • रीढ़ लचीली बनती है, जिससे सर्वाइकल व स्लिपडिस्क, पीठदर्द जैसे कष्टदायक रोग कुछ ही दिनों में दूर हो जाते हैं मूल नाड़ियां तथा स्नायुमंडल सुदृढ़ होता है।
  • मधुमेह , गुर्दे , खांसी, दमा तथा पेट के रोगों में लाभ पहुँचता है और पाचन शक्ति बढ़ जाती है।
  • एड्रिनल ग्रंथि के प्रभवित होने से भावनात्मक संतुलन बनता है।
  • महिंलाओं की बच्चे दानी सही स्थान पर लाने में सहायक है । मासिक स्राव व अल्प मासिक स्राव को ठीक करता है।
  • गले संबंधी दोष – टॉन्सिल इत्यादि में लाभ पहुँचता है।
  • श्वास भरके गर्दन को पीछे की ओर मोड़ने से आकाश तत्व का निर्माण होता है। शारीरिक ऊर्जा में वृद्धि होती है।
  • Medulla oblongata प्रभाव में आने से मस्तिष्क के संकेत तथा अनैच्छिक क्रियाएं सुचारू रूप से होने में सहायता मिलती है।

भुजंगासन विधि –

आसन पर पेट के बल लेट जाएं । दोनों पैरों की एड़ियां तथा पंजो को मिलाकर , लिटाकर तान दें । दोनों हाथों को मोड़कर ठोड़ी के दाएं – बाएं इतनी दूरी पर रखें जितनी कन्धों की चौड़ाई । कोहनियां शरीर से लगी हुई हों तथा पृथ्वी पर ही रहें। माथा पृथ्वी से लगा दें। गर्दन को पीछे की ओर इतना मोड़ें की सर का पिछला भाग रीढ़ से लग जाए।अब धीरे श्वास भरते हुए धड़ को ऊपर उठा दें। कोहनियां थोड़ी इथ जाएँगी। श्वास को सामान्य कर दें। पेड़ू पर भार रहेगा , हथेलियां आसन पर केवल स्पर्श करें। वापस आने के लिए श्वास को निकलते हुए धड़ को धीरे धीरे नीचे लाएं। पूरा धड़ पृथ्वी पर लगाने के बाद माथा भी पृथ्वी पर लगा दें। बाद में शिथिलासन में विश्राम करें।

ध्यान का केंद्रविशुद्धि चक्र

  • इसमें ध्यान देने की विशेष बात यह है कि जितनी देर में आसन की पूर्ण स्थिति को ग्रहण करें उतनी देर में पूरा श्वास भर जाए।
  • ऊपर उठाते समय दो गतियां निश्चित रूप से होनी चाहिये। – (अ) गर्दन का पीछे मोड़ना (आ) धड़ का ऊपर उठना । इसी प्रकार वापस आते समय भी दो गतियां होंगी। (क) धड़ को पहले वापस लाना (ख) फिर माथा वापस लाना । धड़ को वापस करते समय गर्दन न झुकने पाए। गर्दन पीछे की ओर ही रहे।
  • आसन करते समय हथेलियों का दबाव कम से कम हो। हो सके तो पेड़ू के बल उठने का लगातार प्रयास करें। इससे आसन का पूरा लाभ मिलता है। यही अच्छे अभ्यास का सूचक है।
  • आसन करते समय एड़ियां बिलकुल न खुलें और न ही पंजो का ही खिचांव कम हो।

नोट – हर्नियां के रोगी को भुजंगासन नही करना चाहिए।

भुजंगासन कई मायनो में आपके लिए उपयोगी है बस जरुरत है तो नियमित रूप से इस आसन को अपने जीवन में अपनाने की । भुजंगासन की तरह ही मत्स्यासन भी कई बीमारियों से आपको दूर रखता है । मत्स्यासन के बारे में अधिक जानकारी के लिए आगे दिए गए लिंक पर जाएँ। ( बीमारियों को आपके पास न आने दे – मत्स्यासन ) । अगर आपको इस योगासन को अपने जीवन में लाने से लाभ हो या आपको हमारा ये लेख उपयोगी लगा हो तो इस पेज को जरूर लाइक करें । अपने महत्वपूर्ण सुझाव हमे कमेंट बॉक्स में लिखना न भूलें।

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Nidhi Patel

Specialized in Vedic literature with professional experience in field of Ayurveda , & one year experience in content writing makes me able to share my views with others for the benefits of mankind

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